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लक्ष्मण V/s भूमध्य रेखा

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जब देखो हर ऐरा, गैरा, नत्थूखैरा न्यायपालिका को लक्ष्मण रेखा की याद दिलाने लगता है लेकिन आजतक हमारी समझ में यह नहीं आया कि ऐसे लोग इतने बड़े-बड़े संवैधानिक पदों पर कैसे बैठ जाते हैं। जिनको यह ज्ञान भी नहीं है कि लक्ष्मण रेखा किसके लिए और क्यूं खींची गयी थी। संदर्भ के लिए बताते चलें कि लक्ष्मण रेखा सीता और रावण के लिए खींची गयी थी जिसका उद्देष्य था कि यदि रावण (अन्यायी) उस रेखा को पार करके अन्दर आयेगा तो भष्म हो जायेगा और यदि सीता उसके बाहर गयीं तो उनकी सुरक्षा व सम्मान खतरे में पड़ जायेगा।
अब प्रष्न उठता है कि जो लोग न्यायपालिका को लक्ष्मण रेखा स्मरण कराते हैं वे न्यायपालिका को क्या मानते हैं रावण या सीता। यदि रावण मानते हैं तो अबतक न्यायपालिका को भष्म हो जाना चाहिए था क्योंकि जिस दृष्टि से वे लक्ष्मण रेखा को निर्धारित करते हैं (संविधान नहीं) वह तो कई बार लांघी जा चुकी है लेकिन वह भष्म होने के बजाय और सषक्त होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है और यदि सीता (जिसे वे मानते नहीं) मानते हैं तो लक्ष्मण रेखा लांघने के बाद भी सीता को कष्ट जरूर उठाना पड़ा लेकिन उनका गौरव व सम्मान न सिर्फ सुरक्षित रहा बल्कि वह अन्याय, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, विध्वंष का कारण बनी और राम (संविधान) कारक।
आज जहां कार्यपालिका व विधायिका आषीष (सिर तक) भ्रष्टाचार में डूबी गयी है वहां न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है लेकिन इसके आकष्ठ डूबने के बाद भी अभी इसका मुह, आंख, नाक, कान व मस्तिष्क बचा हुआ हैं जिससे जनता को जो विष्वास विधायिका व कार्यपालिका से उठ चुका है वह न्यायपालिका पर थोड़ा बहुत बना हुआ है और वह इसे अंतिम आष के तौर पर देख रहा है। जनता का न्यायपालिका पर यह आषा व विष्वास अकारण नहीं है क्योंकि जब तक एक भी ईमानदार, कर्तव्यानिष्ठ, मानवीय संवेदनाओं से युक्त राष्ट्रभक्त जज बचा रहेगा तब तक यह विष्वास कायम रहेगा और अभी तो एक नहीं बहुत सारे ऐसे जज हैं जो इसकी गरिमा सम्मान व उपादेयता को संरक्षित करने में लगे हैं।
अब वक्त आ गया है कि न्यायपालिका लक्ष्मण रेखा की परवाह न करते हुए उस भूमध्य रेखा की ओर बढ़े जो न्याय व अन्याय, ईमानदारी व भ्रष्टाचार कर्मठता व अकर्मण्यता, नैतिकता व अनैतिकता के बीच खिंची है और अन्याय, भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, अनैतिकता को मिटाने में अपनी भूमिका का निर्वाह करें।